Friday, 2 February 2018

Why we get hurt.

Whenever anyone say something about us, it affects us. If the thing is good we feel better and if it is bad, we get hurt. Most of the times people say bad things and we get hurt, and other way around we only worry about the bad things said about us and want people to say good things only. But do you want to know that why we get hurt?



The reason is our nature that we want to listen good things about us while we focus on bad things only. Even if we focus on bad things we don't look into the reality of anyone's allegations. This makes us vulnerable. And our vulnerability is the only reason that we get hurt.

How can we stop this?

Well, we are not here to please any one neither are others here to always be happy with us. So, first of all stop seeking certificates from everyone to approve your personality.

Just have faith in yourself. But at the same time introspect time to time. If you are not here to please everyone then you are not here to hurt either. So, don't do anything with anyone which you don't like for yourself. Everything else will automatically be fine.

And finally, when you are very conscious about people saying bad things about you, you should look, if they are true. If they are then you should take note of them and work to refine your personality.

I hope you like my suggestions. Please take care of yourself and don't worry too much. Life is too short. Be happy and keep searching your consciousness. The more you conscious or aware, more life you will feel inside you.

Have a nice day and nice life.

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Saturday, 6 January 2018

नए का भय या मस्तिष्क की चाल?


जब भी हम कुछ नया शुरू करते हैं या नया करने का प्रयास करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में डर पहले पैदा हो जाता है/ और कई बार ये डर हमारी असफलता का कारण बन जाता है और कई बार इस डर के कारण हम कोई नयी शुरुआत ही नहीं कर पाते हैं/ किन्तु प्रश्न ये उठता है कि क्या यह डर वास्तविक है? क्या हम सच में सक्षम नहीं होते है? आइये इस वारे में आगे बात करते हैं/

मेरा मानना है कि हम सब जब कोई नयी शुरुआत करने का विचार करते हैं तो हमारे पास वो काम करने की क्षमता होती है, या फिर हम उस क्षमता को अर्जित करने की क्षमता होती है/ मेरा कहने का तात्पर्य है कि हम अधिकांशतः अपने ज्ञान और अपनी क्षमताओं के अनुसार ही किसी उद्दयम का चयन करते हैं/ अतः हमारे डर का कोई कारण नहीं होता है/ फिर भी हमारे मस्तिष्क में डर उत्पन्न होता है, उस का क्या कारण है? और उपाय क्या है? (जानने के लिए अंत तक पढ़ें)


नए के डर का कारण/

एक पुरानी कहाबत है कि-
आपका मस्तिष्क एक अच्छा सेवक है
किंतु एक बुरा स्वामी है।

और हमारे डर का कारण हमारे द्वारा अपने मस्तिष्क को स्वामी बन जाने देना है/ जब हमारा मस्तिष्क स्वामी बन जाता है तो वह हमेशा हमें उन्ही कामों को आकर्षित कराता है जो हमें क्षणिक आनंद कि अनुभूति कराते हैं/ और जिन कामों में मस्तिष्क को विचार करना होता है या कोई परिश्रम करना होता है उन कामों से ये सदैव बचने के उपाय ढूंढता रहता है/ कभी ये हमें आलसी बना देता है या कभी हमारे अन्दर अविश्वास पैदा करने के लिए पुरानी असफलताओं की घटनाओं को संकलित करके रख देता है/  और सबसे बड़ा अस्त्र जिसका प्रयोग ये करता है वो है डर/

प्रायः हमें डर उन चीजों से लगता है जिनसे हम अनभिज्ञ होते हैं/  और उस डर को हम उन चीजों को जानकर समझकर दूर कर सकते हैं/ किन्तु हमारा मस्तिष्क ना ही जानना चाहता है और ना ही उन चीजों को जानने और समझने के लिए प्रेरित नहीं करता है/ वल्कि ये अपने ही अन्दर सुरक्षित सूचनाओं को संकलित करके हमारे समक्ष इस प्रकार प्रस्तुत करत है जैसे कि वो नया काम या उद्दयम हमारी क्षमता से बहुत ही बड़ा है और हमारे लिए असाध्य है/ इस प्रकार हम उस और प्रयास बंद कर देते हैं और ये हमें उन नयी  चीजों से अनजान बनाये रखता है और डर कायम रखता है। इस प्रकार मन परिश्रम से बाख जाता है और हमें क्षद्म वस्तुओं और घटनाओं में फसे रहने देता है/

इसका उपाय क्या है?

इसका उपाय है धीरे धीरे स्वामी बनें मस्तिष्क को सेवक बनाना है/ जब भी हम कोई नया उद्दयम या अपने उन्नति के लिए नए प्रयास शुरू करें तो हमें कार्य शुरू होने से पहले अपनी क्षमताओं औए अपने ज्ञान का इमानदारी से आंकलन कर लेना चाहिए/ और उसके बाद उसकी पूर्ती के लिए  अपने प्रयास शुरू कर देने चाहिए/ और शुरू करने के बाद मन के छलावों में ना आकर मस्तिष्क को काम पर लगने के लिए प्रेरित करना चाहिए/ जब भी अनजान वस्तू या कार्य का डर उत्पन्न हो तो हमें उस कार्य को जानने का प्रयास शुरू करने चाहिए जिससे हमारा डर दूर हो जायेगा?
हमारे अन्दर विश्वास उत्पन्न होगा/ और सफलता कि प्राप्ति होगी/


कृपया मेरी इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें/ धन्यवाद

Wednesday, 6 December 2017

जब तक "मैं", तब तक हरि नाहि।

मदद करने वाले के पीछे भी वो (ईश्वर) है, और मदद पाने वाले के पीछे भी वो है। मदद करने वाले के मन में जो "मैं" है, और मदद पाने वाले के मन में जो "मैं" है, वह बस अज्ञान है।

ज्ञान "मैं" को हटा देता है और एक दूसरे के पीछे खड़े परमात्मा का साक्षात्कार करा देता है। फिर प्राणी समझ जाता है कि दोनों एक ही है। लेकिन जब तक अज्ञान रहता है प्राणी खुद को ही कर्ता समझता रहता है और मन में अहंकार का पोषण करता रहता है। और एक समय अहंकार इतना शक्तिशाली हो जाता है कि प्राणी "मैं" के अतिरिक्त कुछ सोंच ही नहीं पता है और शरीर के जीवनकाल में सत्य को जानने या सत्य के निकट पहुंचने के रास्ते बंद कर देता है।

सबसे अद्भुत स्थिति तो मुझे उन लोगों की लगती है जो अपने-अपने ईश्वर की सुबह-शाम उपासना करेंगे, उपवास करेंगे, ईश्वर के नाम में भंडारे करेंगे किन्तु इन सभी पुण्य कर्मों से भी अपने अहंकार का पोषण ही करते है। क्योंकि जब तक "मैं" नही जाता ईश्वर को स्थान ही नही होता है। ये श्लोक एक दम सही से इस स्थिति का वर्णन करता है, की
जब मैं था, तब हरि नहीं।
अब हरि हैं मैं नाहि।।
सब अंधियारा मिट गया।
जब दीपक देख्या माहिं।।

अतः हम सभी यदि को "मैं" की दीवार को हटाने के लिए और सत्य रूपी परमात्मा से साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।  जहां भी ज्ञान का दीपक दिखाई दे उससे अपने मन के तिमिर को मिटाने का प्रयास करना चहिये।
नमस्कार। कृपया इस पोस्ट को शेयर करें और मेरे और अपने पीछे के परमात्मा से साक्षात्कार में मदद करें।
                                 ।ॐ शांति ॐ।

Friday, 10 November 2017

मृत्यु के बाद भी क्या समाप्त नहीं होता?

जब सिकंदर की मृत्यु हुई तो उसने मरने से पहले ये कह रखा था कि जब उसकी शवयात्रा निकाली जाय तो उसके हाथ ताबूत से बाहर निकाल दिए जाएं। ताकि लोग ये देख सकें कि सिकंदर भी अपने साथ कुछ ना ले जा सका।
ऐसी कई बातें हम धार्मिक गुरुओं से सुनते है तथा धार्मिक पुस्तकों में पढ़ते हैं। लेकिन क्या कुछ ऐसा है जो हम मृत्यु के बाद भी साथ ले जा सकें?
मेरा उत्तर है हाँ। एक चीज है जो हमारे साथ जाती है हर स्थिति में वो है आध्यात्मिक प्रगति। हम अपने जीवन में ऐसे कई लोगों को देखते हैं तथा उनके किस्से भी सुनते जिन्होंने जीवन मे शून्य से शुरू करके अपार प्रगति की तथा अपार सफलता अर्जित की किन्तु जब उनका अंतिम समय आया तो कुछ भी उनके साथ ना गया। किन्तु आध्यात्मिक स्तर पर हम जो भी अर्जित करते है वह सदैव हमारे साथ रहता है। और मृत्यु के बाद भी हमारे साथ ही जाता है, और यह भी निर्धारित करता है कि अगले जन्म में हमारा जीवन किस ओर और किस प्रकार प्रगति करेगा।
ओशो अपने एक भाषण में कहते हैं कि भगवान बुद्ध कोई एक जीवन में बुद्ध नहीं बने थे। वो अपने पिछले कई जीवन के आध्यात्मिक प्रयासों और उनके परिणामों का योग के बाद बने संयोग का परिणाम थे।

किन्तु भगवान बुद्ध या किसी भी ऐसी महान आत्मा जिसका साक्षात्कार परम सत्य से हो चुका हो, के बारे में कोई बड़ी बात कहना मेरी क्षमता के बाहर है। परंतु में यह अवश्य कह सकता हूँ कि आध्यात्मिक प्रगति हमारे साथ रहती है तथा हमारे जीवन का मार्ग प्रसस्त करती है।

अतः हम सभी को भौतिक सुख साधन जुटाने के साथ ही आध्यात्म के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए।
अंततः यही हमारी आत्मा का परम उद्देश्य है।

नमस्कार। ॐ शांति ॐ

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अग्रिम मैं। धन्यवाद।

Sunday, 8 October 2017

मन के भीतर की भीड़।


संसार में शायद कुछ ही लोग होंगे जिन्हें भीड़ से प्रेम होगा। लगभग सभी भीड़ से दूर समय व्यतीत करना चाहते हैं। चाहें कुछ पल ही क्यों न मिलें। जब कोई मानसिक रूप से थकान महसूस करता है तो डॉक्टर भी  यही सुझाव देते हैं कि कुछ दिन भीड़ भाड़ से दूर समय ब्यतीय कीजिये।

लेकिन भीड़-भाड़ से दूर जाके हर किसी को आराम नहीं मिल पाता। शांत जगह भी बैठ के मन के भीतर अशांति रहती है। क्या हम इसका कारण जानते हैं?
इसका कारण है हमारे मन के अंदर की भीड़ जो हमारा साथ नहीं छोड़ती।

लेकिन!!! मन के भीतर की भीड़❔❔❔ ये कैसी भीड़ है?
सामान्यतः बाहरी भीड़ में परिचित ब्यक्ति भी होते हैं और अपरिचित ब्यक्ति भी होते है। किंतु मन की भीड़ में वही लोग होते हैं जिनसे हम परिचित होते हैं। वो ब्यक्ति अपने बिचारों से सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनो प्रकार से प्रभावित करते हैं। और हमारे निर्णयों तथा हमारी सोच को प्रभावित करते हैं। हम कई बार खुद को स्वतंत्र करना चाहते हैं किंतु अपने व्यक्तित्व की दुर्बलता के कारण खुद को उनके विचारों से, और इस सोंच से की हमारे कुछ करने से वो क्या सोंचेंगे, से अलग नहीं कर पाते। हम लोग उनके अच्छे या बुरे बिचारों को खुद से चिपका लेते हैं और फिर एकांत जगह मन की शांति की तलाश करते रहते है ठीक वैसे ही जैसे कि कस्तूरी मृग अपने उदर में कस्तूरी लिए कस्तूरी की तलाश में भटकता रहता है। और वो उसे कभी नहीं मिलती।

तो प्रश्न ये उठता है कि समाधान क्या है? कैसे मिले एकांत? कैसे करें इस भीड़ को दूर?
मन की भीड़ से दूर जाने का भी तरीका भी वही है जो बाहर की भीड़ से दूर जाने का है। साधन युक्त व्यक्ति भीड़ को दूर करने के लिए भीड़ से दूर चला जाता है। दुनिया की भीड़ को दूर करने के लिए आपके पास साधन का होना जरूरी है वरना ना चाहते हुए भी आपको रोज बस, मेट्रो में धक्के खाना पड़ता है औऱ ये चलता रहता है क्योंकि आपके पास विकल्प नहीं होता। आपको अपना जीवन चलाने के लिए कार्य करना पड़ता है। साधनवान अपनी साउंडप्रूफ महंगी कार में शीशे चढ़ाता है तथा आफिस में भी एक अकेले के केबिन में बैठता है और समय समय पर छुट्टियां मनाने जाता है। लेकिन मन की भीड़ से शायद वो भी न बच पाता हो। क्योंकि मन की दशा में ये साधन काम नही आते। 
मन में एकांत के लिए जो साधन आवश्यक है वो है एक शक्तिशाली व्यक्तित्व। शक्तिशाली व्यक्तित्व के लिए कुछ घटक है जिनके विकाश से व्यक्तित्व का निर्माण किया जा सकता है।
1. आत्मविश्वास- अपने निर्णय तथा अपनी सोंच पर विश्वास होने पर ही हमारे अंदर आत्मविश्वास का निर्माण होता है। और वो विश्वास हमे तब प्राप्त होता है जब हम ये जानते हैं की हम सही है। हमारी सोंच और हमारा निर्णय सकारत्मक है तथा किसी को नुकसान पहुचने की सोंच से प्रेरित नहीं है। ये हमारे स्वयं के उत्थान के लिए है।

2. समभाव- समभाव से तात्पर्य है कि हम सभी के प्रति समान भाव रखते है। एक ओर जहां हम अपनी स्वतंत्रता तथा अपने मौलिक अधिकारों के प्रति सजग है वही दूसरी ओर हम इस बात का ध्यान रखते हैं कि हम दूसरे प्राणियों के मौलिक अधिकारों तथा स्वन्तंत्रता में सेंध नही लगा रहे।

3. समाज के प्रति संतुलित सोंच- किसी ने सच कहा है कि यदि सभी आपसे खुश है तो आप जरूर दुखी ब्यक्ति हैं। इसलिए हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि हम सभी को खुश नहीं रख सकते। लेकिन ये मान लेना भी गलत है कि उपरोक्त कथन का उल्टा , यानी कि सभी को दुखी करने से आप सुखी हो सकते है। समाज में आपके अधिकार भी है और दायित्व भी। इसलिए समाज के प्रति आपकी सोंच का संतुलित होना आवश्यक है। 

उपरोक्त घटकों का सही समन्यवय आपके व्यक्तित्व को शक्तिशाली बनाता है तथा आपके मन के भीतर के निरर्थक बिचारों से मुक्ति देता है। आपको ये नहीं सोचना पड़ता कि आपके संबंध में को क्या सोंच रहा है, क्योंकि आप पहले से ही सबका समन्यवय कर चुके होते है और धीरे धीरे आपका ब्यक्तित्व ही उस आधार पे निर्मित हो जाता है।
अंत तक मेरा लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद। कृपया करके इसे अपने मित्रों के साथ शेयर करे। अपने कीमती comments भी करें। और यदि आप मेरे ब्लॉग को फॉलो करेंगे तो मुझे अति प्रसन्नता होगी। और आपतो जानते ही हैं कि प्रसन्नता बांटने से प्रसन्नता मिलती है।
नमस्कार।



Monday, 18 September 2017

निराकार का अंश।

साकार तू है
तो क्या हुआ।
निराकार का तू अंश है।।
निर्भीक बन
तू आगे बढ़।
चाहे सामने तेरे
क्यों ना कोई कंस है।।
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द्वंद है, विध्वंश है
संकट में जो धर्म है।
तब मन में लिए प्रश्न तू,
अर्जुन नही
कृष्णा का तू अंश है
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Friday, 15 September 2017

संसार का संचालक कौन???

हम सभी में से लगभग सारे लोग यह मानते हैं कि ईश्वर इस संसार का संचालक है। ऐसा मानने के साथ ही ये विचार भी अनायास ही आता है कि जब ईश्वर इस संसार को चलाता है तो फिर इस संसार में इतनी बुराई क्यों है?
इस प्रश्न का उत्तर मुझे एक जानकार व्यक्ति से प्राप्त हुआ। उन्होंने समझाया की ईश्वर इस संसार का संचालन नहीं करता। अपितु ईश्वर द्वारा प्रकृति का निर्माण किया गया। जिसे लोग प्रायः माया के नाम से भी जानते है, और उसी माया या प्रकृति के द्वारा इस सम्पूर्ण संसार का संचालन होता है। और सभी प्राणी प्रकृति के नियमों से वाद्य है और कर्मानुसार परिणाम को प्राप्त होते है। अतः ईश्वर को किसी भी घटना या दुर्घटना के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
उनकी बात को अगर मैं आज के परिपेक्ष् में समझाने की कोशिश करुं तो यह कहना गलत न होगा कि ईश्वर ने प्रकृति या माया नाम के software का निर्माण किया है। जोकि प्राणियों के कर्मो के इनपुट को स्वीकार्य करता हूं तथा उन्ही कर्मों के आधार पर ही परिणाम का आउटपुट देता है। इस सॉफ्टवेयर के भी कुछ निष्चित सिद्धांत है जिनसे यह नहीं हटता।
अतः जैसा प्राणी सॉफ्टवेयर में इनपुट देता है वैसा ही आउटपुट पाने को बाध्य होता है। अब प्रश्न यह उठता हौ की जब सब कर्मों पर आधारित है तो ईश्वर की उपासना से क्या लाभ है?
इस प्रश्न के उत्तर के लिए अगली पोस्ट का इंतजार करें और मेरे इस ब्लॉग को सब्सक्राइब करें। इस पोस्ट को अंग्रेजी में भी ट्रांसलेट करने की में कोशिश करूंगा।
नमस्कार । आपका जीवन मंगलमय हो और ईश्वर की कृपा सभी पर बनी रहे।

कृपया मेरे ब्लॉग को फॉलो करें तथा इस पोस्ट पर अपने comments करें और अपने मित्रों के साथ अवश्य ही शेयर करें।
धन्यवाद

Why we get hurt.

Whenever anyone say something about us, it affects us. If the thing is good we feel better and if it is bad, we get hurt. Most of the times...